एक ऐसा शक्स जो कभी हार नहीं मानता। आखरी कोशिश के बाद भी एक चांस लेना पसंद करता है। पत्रकार बना क्योंकि समय की नजाकत थी। अच्छा लिख लेता हूँ, क्योंकि शौक को अपना प्रोफेशन बनाया। खुद पर यकीं है और मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा काम है, जिसे मैं नहीं कर सकता। अपने फैसलों पर टिके रहना मेरी आदत है।

Tuesday, January 6, 2009

फोटोग्राफी कहां से सीखी?


सामान्य रहकर असामान्य काम करना कितना आसान होता है। वो काम जो पहली नजर में भा जाए। तीन महीने ही हुए थे मुझे अपना साइबर शॉट कैमरा लिए। स्टाम्प घोटाले की खबर (स्वर्ग से दलाली) करने के दौरान कुछ वीडियो क्लिप बनाने के लिए इसे लिया था। काम भी आया। लेकिन फोटोग्राफी में अलग करने का मन लगातार कर रहा था। फिर कार्टूनिस्ट अभिषेक तिवारी लगातार कैमरे का भरपूर इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। सच कहंू तो अब भी वो पीछा नहीं छोड़ते, अच्छे गुरु की तरह।

एक फरवरी 2007 का दिन था। खबर के सिलसिले में ऑफिस से निकलते देर हो गई थी। रात के साढ़े दस बजे होंगे लगभग। सौभाग्य से उस दिन घर पर कोई था नहीं। मैंने सोचा क्यों न आज फोटोग्राफी गुरु की बात मान ही ली जाए। बीच रास्ते पिकॉक गार्डन था। मैं वहीं रुक गया। रात के अंधेरे में तीन चौकीदार और मैं अकेला चमकीले चिल्के छलकाता हुआ। कुछ फव्वारों की तस्वीरें खींची। कुछ पुल के बड़े खंभों की उदासी को कैद किया। पर बात नहीं बनीं। वहीं एक फव्वारे की मैंने कुछ तस्वीरें ली थी। इन्हीं तस्वीरों में से किसी एक में एक बूंद कुछ ऐसी दिखाई दे रही थी, जैसे कोई धूमकेतू हो। आइडिया लगाया और लग भी गया। मैं ठीक फव्वारे के ऊपर कैमरा सैट करके लगातार तस्वीरे खींचने लगा। डेढ़ घंटे तक लगातार 140 से ज्यादा तस्वीरें खीचने के बाद नीचे देखा, तो घुटनों तक जूते और पैंट पूरे भीग चुके थे। इतने की जूते तो अगले चार दिन पहन भी ना पाओ। घर लौटा। कंप्यूटर पर बैठ कर श्रेष्ठ 20 तस्वीरों की छंटनी की। अगले ही दिन झालाना कार्यालय संस्थान के टॉप 100 की टीम के लिए चल रही इंग्लिश क्लास के पहले गिरीश उपाध्याय जी को सवेरे-सवेरे प्रस्तुत कर दी। उस दौरान हम तीन महीने तक हर रोज क्लास में आते और अच्छी खबरों की चर्चाएं सवेरे-सवेरे ही हो जाया करती थी। शाम को पता चला, तीन कॉलम में फोटो प्रकाशित हो रही है।

प्रकाशन से पहले फोटोग्राफर, रिपोर्टर, डेस्क एडिटर या कोई और जो उसे देख रहा था अपनी अलग ही परिभाषा दे रहा था। कोई उसे अनानास बताता, कोई धूमकेतू बताता, तो कोई क्रिस्टल की बॉल। भले-भले फोटोग्राफर भी पहचानने में गच्चा खा गए। अगले दिन जैसे ही फोटो छपी। हर कोई आश्चर्यचकित था। पानी की बूंदों का गोला, सबको अब भी अनानास या क्रिस्टल बॉल नजर आ रहा था। इसके सप्ताह भर बाद जब एक खबर के सिलसिले में कुछ सरकारी विभागों में फोन किए, तो हर कोई मेरे कुछ बोलने से पहले ही बोल रहा था, 'क्या कमाल फोटो खींचा आपने। फोटोग्राफी अच्छी करते हो। कहां से सीखी? फोन के दूसरी ओर एक खुली मुस्कुराहट के सिवा कोई जवाब मेरे पास नहीं था। क्योंकि डेढ़ घंटे भीगने के बाद जो हालत मेरी थी, वो किसी ने नहीं देखी थी। लेकिन फोटो सबने देखी थी।

 
Design by Wordpress Theme | Bloggerized by Free Blogger Templates | coupon codes