एक ऐसा शक्स जो कभी हार नहीं मानता। आखरी कोशिश के बाद भी एक चांस लेना पसंद करता है। पत्रकार बना क्योंकि समय की नजाकत थी। अच्छा लिख लेता हूँ, क्योंकि शौक को अपना प्रोफेशन बनाया। खुद पर यकीं है और मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा काम है, जिसे मैं नहीं कर सकता। अपने फैसलों पर टिके रहना मेरी आदत है।

Sunday, September 6, 2009

बिना हाथ और पैरों के जिंदगी की जंग !


एक जगह आकर छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, मैं-तुम सारी दूरियां मिट जाती हैं। जंग होती है, तो जिंदगी से जूझने की। हौसला बनाए रखने की। बिना दोनों हाथ और बिना दोनों पैरों के भी विजेता बनने का सपना बुनने और उसे पूरा करने का हौसला रखने वाले इस शक्स क्ले डायर को देखकर मुझे तो यही लगता है। ...कुछ न हो, तो भी कैसे हंसी-खुशी भी जिंदगी को जिया जाए, क्ले अपने शब्दों में बेहतर तरीके से बता सकते हैं-

अगर आपके हाथ-पैर सलामत हैं, तो अपने आपको खुशकिस्मत समझिए। मेरे न तो हाथ हैं न पैर। सिर्फ आधा हाथ है, वह भी ऐसा कि अब तक जिसने देखा, उसे हाथ के होने न होने में कोई अंतर नजर नहीं आया। आज तीस साल की उम्र में मेरी ऊंचाई मात्र 40 इंच और वजन 39 किलोग्राम है। मेरी पैदाइश हैमिल्टन, अल्बामा की है। मेरी पहचान सिर्फ इतनी ही नहीं है। एक पेशेवर मछुआरा, जो बिना हाथ-पैरों के 200 से ज्यादा मछली पकडऩे वाली प्रतियोगिताओं का आकर्षण रह चुका है, के तौर पर मेरी पहचान ज्यादा मजबूत है। आपको खुशी होगी जानकर कि इनमें 25 प्रतियोगिताओं में मैंने जीत हासिल की है।
हैमिल्टन में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के बाद पांच साल का होते-होते मुझे खुद और दूसरे बच्चों में फर्क का पता चला। मेरे दोनों हाथ और दोनों पांव नहीं थे। एक 16 इंच का दायी तरफ आधा-अधूरा हाथ मेरे शरीर से चिपका था, जिसे कभी किसी ने इस अधूरे शरीर पर फायदेमंद नहीं समझा। एक छोटी व्हील चेयर मुझे बचपन में ही दिला दी गई। इसी से मुझे मां, तो कभी पिताजी स्कूल छोड़कर आते और वापस लाते। लेकिन अपने आधे हाथ का सहारा लेकर अपने छोटे-मोटे काम मैंने खुद करने शुरू कर दिए थे। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल का होते-होते मैंने मछलियां पकडऩी शुरू कर दी। जब पहली बार मछली पकडऩे गया, तो पूरी तरह डरा हुआ था। बोट को चलाने में मुझे बेहद डर लग रहा था। ...लेकिन मैं अंदर ही अंदर महसूस करता था कि डर के आगे जीत है। कुछ ही दिनों में मैंने संतुलन बनाना सीख लिया था, लेकिन ज्यादातर मछुआरे मेरी क्षमताओं को लेकर आशंकित रहते। उन्हें आश्चर्य होता मुझे देखकर कि मैं औरों जैसा नहीं हूँ और मैं उस तरीके से मछलियां नहीं पकड़ सकता। मैंने कुछ तरीके ईजाद किए जैसे अपने दांतों से गांठ लगाना और मछली कांटे में फंसते ही ठुड्डी का सहारा लेकर उसे बाहर निकाल लेना।
मछली पकडऩे के लिए बोट भी खुद ही ड्राइव करना बेहद मुश्किल होता है। कई बार मेरे दोस्त बोट ड्राइव करते हैं और मछलियां पकडऩे के लिए मैं छड़ को अपनी ठुड्डी का सहारा देता हूँ। मछली पकडऩे के कांटे में गांठ लगानी हो, तो अपनी जीभ और दांतों की मदद लेता हूँ। मुझे तैराकी पसंद है। जब भी मछली पकडऩे की कोई प्रतियोगिता होती है, तो पूरा शरीर थककर चूर हो जाता है। ऐसे में अपने शरीर को रिलैक्स देने के लिए मुझे अगले ही दिन स्वीमिंग करनी पड़ती है। मैं जानता था कि मुझमें सीखने की इच्छाशक्ति कूट-कूट कर भरी है और मैं जितना समय मछलियां पकडऩे में दूंगा, मेरा हुनर उतना ही संवरता चला जाएगा।

जब भी दूसरे मछुआरे मुझे देखते थे, वह समझ ही नहीं पाते कि यह आधे हाथ वाला आदमी मछली कैसे पकड़ेगा? मैं हमेशा सिर्फ इतना ही सोचता हूँ कि जहां हूँ, वहां सबसे बेहतर क्या कर सकता हूँ? मुझे बचपन से बेसबॉल खेलना पसंद रहा है। मैं हमेशा जानता था कि मैं कभी पेशेवर बेसबॉल खिलाड़ी नहीं बन पाऊंगा, लेकिन मेरा पक्का विश्वास था कि मैं बेहतरीन पेशेवर मछली पकडऩे वाला बन सकता हूँ। ...और मैंने सही सोचा था। मुझे लगता है मैं वही कर पाता हूँ, जो ईश्वर मुझसे करवाना चाहता है।

6 comments:

hem pandey said...

ऐसे बुलंद हौसले को नमन.

राजीव तनेजा said...

इनकी हिम्मत...जज़्बे और इच्छाशक्ति को सलाम

हँसते रहो

अजय कुमार झा said...

यही तो वो लोग हैं....जो लाखों के लिये प्रेरणा बन जाते हैं...सचमुच इनकी हिम्मत को सलाम....

Udan Tashtari said...

हिम्मत करने वालों की--हार नहीं होती.

नमन इस हौसले को!!

काव्या शुक्ला said...

इसे देख कर लगता है, जहां चाह, वहां राह।
वैज्ञानिक दृ‍ष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को उन्नति पथ पर ले जाएं।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

जहां चाह,वहां राह।अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...

 
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