एक ऐसा शक्स जो कभी हार नहीं मानता। आखरी कोशिश के बाद भी एक चांस लेना पसंद करता है। पत्रकार बना क्योंकि समय की नजाकत थी। अच्छा लिख लेता हूँ, क्योंकि शौक को अपना प्रोफेशन बनाया। खुद पर यकीं है और मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा काम है, जिसे मैं नहीं कर सकता। अपने फैसलों पर टिके रहना मेरी आदत है।

Saturday, July 31, 2010

साइबर सुरक्षा खतरे में : एक्सक्लूसिव पड़ताल


आयकर विभाग समेत कई सरकारी वेबसाइटों में हैकर्स लगा सकते हैं सेंध

चीन की साइबर सेंधमारी के बाद भी केन्द्र और राज्य सरकारों में साइबर गोपनीयता को लेकर संवेदनशीलता देखने को नहीं मिल रही है। सरकारी विभागों में गोपनीयता पैमानों के बावजूद इंटरनेट के जरिए साइबर सेंधमार इन गोपनीयताओं को भंग कर रहे हैं। विभागों को अंदाजा भी नहीं है और उनका सरकारी गोपनीय रिकॉर्ड, डाटा हैकर्स के लिए खुला पड़ा है। पत्रिका स्पॉट लाइट और एथिकल हैकर्स की टीम ने साइबर सुरक्षा के हालात और यथास्थिति का खुलासा करने के लिए हाल ही पड़ताल शुरू की। पड़ताल में भारत सरकार के आयकर विभाग के अलावा राजस्थान व मध्य प्रदेश की आधा दर्जन से ज्यादा सरकारी वेबसाइटें असुरक्षित मिलीं। यहां तक कि इन दोनों राज्यों की पुलिस की वेबसाइटों में भी आसानी से सेंधमारी की जा सकती है।

राजस्थान सरकार के सचिवालय की वेबसाइट को भी असुरक्षित पाया गया। सचिवालय की वेबसाइट में कमियों का फायदा उठा कर साइबर क्रिमिनल सचिवालय के ऑनलाइन गोपनीय दस्तावेज, कंप्यूटर्स में सुरक्षित फाइलें, सरकार की गोपनीय जानकारियां आसानी से चुरा सकते हैं। साथ ही विभिन्न विभागों, सचिवों, उच्च अधिकारियों के ऑर्डर, सर्कुलर, नोटिफिकेशन और संशोधन संबंधी जरूरी दस्तावेज में हैकिंग के जरिए ही छेड़छाड़ की जा सकती है, उन्हें बदला जा सकता है। वेबसाइट को डिफेस (बंद) भी किया जा सकता है। सचिवालय के अलावा राज्य सरकार के राजस्थान कृषि विपणन बोर्ड, जयपुर विकास प्राधिकरण, महिला एवं बाल विकास विभाग, राजस्थान पुलिस, कार्मिक विभाग, जिला सूचना तंत्र, वित्त विभाग, उद्योग विभाग की वेबसाइटों को भी एथिकल हैकर्स ने असुरक्षित पाया। मध्य प्रदेश पुलिस और संभागीय जनसम्पर्क कार्यालय, इंदौर की वेबसाइटें भी इस पड़ताल में असुरक्षित मिली।

(इस एक्सक्लूसिव पड़ताल को विस्तार से पढऩे के लिए चित्र पर क्लिक करें)

Monday, March 15, 2010

ई-उपभोक्ता देवो भव!



उपभोक्ता अब नए रूप में उभर रहा है। वह हाईटेक है और दुनिया की हर चीज को पलों में खरीदने में सक्षम भी। मजबूती से उभर रहे ई-कंज्यूमर पर रिपोर्ट।

दुनिया मुट्ठी में कैद हो सकती है!' बात सुनने में जरा अटपटी है, लेकिन युवा भारत का 'आम आधुनिक उपभोक्ता' अब कुछ ऐसा ही सोचता है। वह सऊदी के खजूर, लंदन का इत्र और स्विट्जरलैंड की चॉकलेट घर बैठे खरीद रहा है। अपने प्यार के इजहार भरा फूलों का गुलदस्ता घर से ही ऑर्डर करता है और अपने बाऊजी का नया मोबाइल, मां की घड़ी, बहन के सोने के कंगन तक की खरीद बस पलक झपकते ही कर लेता है। क्योंकि अब उसे लाला का भाव-ताव और सामान की ढुलाई रास नहीं आती। खरीदारी के लिए जेब में भरे नोट भारी लगते हैं और कैशलैस रहना उसे पसंद आने लगा है। सुई खरीदनी हो या हवाई जहाज का कोई पुर्जा, बस चंद मिनटों की दूरी पर उसे मिल जाते हैं। क्योंकि वह इंटरनेट के जरिए अब अपनी पसंद और ख्वाहिशें बस एक क्लिक में पूरी करने में सक्षम हो गया है।



(इसे विस्तार से पढऩे के लिए कृपया चित्र पर क्लिक करें। शुक्रिया)

Saturday, December 26, 2009

इतिहास रचा, राजस्थान ने बनाए दो विश्व रिकॉर्ड


प्रतिष्ठित गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स के लिए राजस्थान से पहली बार एक साथ दो विश्व रिकॉर्ड कायम करने के लिए सफल प्रदर्शन किया गया। शहर के ट्रायटन मॉल में आयोजित एक प्रदर्शन कार्यक्रम में हजारों लोग विश्व रिकॉर्ड के साक्षी बने। यहां शहर के छह युवाओं ने दो विश्व रिकॉर्ड अपने नाम करते हुए सफल प्रदर्शन किया जिसमें विश्व का सबसे बड़ा कैलेंडर और विश्व की सबसे लंबी सुई का रिकॉर्ड शामिल है।

यह 2 विश्व रिकॉर्ड हुए ब्रेक:-

1. विश्व का सबसे बड़ा 'लार्जेस्ट वॉल कैलेंडर' जिसका आकार 120 फीट x 40 फीट और वजन 115 किलोग्राम है। विश्व का सबसे बड़ा कैलेंडर 'लार्जेस्ट वॉल कैलेंडर' बनाने का रिकॉर्ड इससे पहले 23 मार्च, 2007 को जर्मनी की एक संस्था ने अपने नाम करवाया था। यह कैलेंडर 104 फीट x32 फीट का था।

बनाने वाली टीम : मनमोहन अग्रवाल व अनुज कुच्छल।


2.विश्व की सबसे बड़ी सुई 'लार्जेस्ट स्विंग नीडल'। सुई का आकार 8.1 फीट। विश्व की सबसे बड़ी सुई 'लार्जेस्ट स्विंग नीडल' का रिकॉर्ड इससे पहले ब्रिटेन निवासी जॉर्ज डेविस के नाम था। डेविस ने 6 फीट 1 इंच की सुई बनाकर रिकॉर्ड अपने नाम किया था।

बनाने वाली टीम : निशांत चौधरी, राजबाला, आलोक शर्मा, प्रवीण जाखड़।

रिकॉर्ड होल्डर्स की मौजूदगी में हुआ प्रदर्शन


विश्व रिकॉर्ड प्रदर्शन के साक्षी बने देशभर से आए रिकॉर्ड होल्डर्स अनिल सैन, विष्णु अग्रवाल, सुखविंदर, यशपाल, सुनील जांगिड़, भवानी सिंह, आयुष, जगमोहन सक्सेना, नवरत्न प्रजापति, गोपाल प्रसाद शर्मा, बलदेव चावला, चेतन सोनी, प्रदीप कुमार सोनी, पीयूष दादरीवाला में से कईयों ने अपनी कला / रिकॉर्ड कार्यक्रम में प्रदर्शित किए।

Tuesday, December 22, 2009

जयपुर में हम बना रहे हैं दो विश्व रिकॉर्ड, आप भी साक्षी बनें


राजस्थान के इतिहास में यह पहला मौका है, जब गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स के लिए दो विश्व रिकॉर्ड एक साथ बनाए जा रहे हैं। इन दोनों ही विश्व रिकॉर्ड के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से स्वीकृत मिल चुकी है।

रिकॉर्ड :-

1. विश्व का सबसे बड़ा 'लार्जेस्ट वॉल कैलेंडर' जिसका आकार 120 फीट गुणा 40 फीट है।
बनाने वाली टीम : मनमोहन अग्रवाल व अनुज कुच्छल।

2. विश्व की सबसे बड़ी सुई 'लार्जेस्ट स्विंग नीडल'। सुई का आकार 8.1 फीट।
बनाने वाली टीम : निशांत चौधरी, राजबाला, आलोक शर्मा, प्रवीण जाखड़।

यह दोनों विश्व रिकॉर्ड 26 दिसंबर, 2009 को सुबह 11.15 मिनट पर ट्राईटोन मॉल, झोटवाड़ा पुलिया, जयपुर में सार्वजनिक प्रदर्शन के साथ बनाए जाएंगे।

इन दोनों रिकॉड्र्स के बारे में 21 दिसंबर, 2009 को प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, याहू डॉट कॉम और चेन्नई ऑनलाइन डॉट कॉम की ओर से जारी खबर पढऩे के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें -



Thursday, December 17, 2009

...ये कौन 'पत्रकार' है!



इस कैरीकेचर को बनाने वाले चंद्रप्रकाश शर्मा (कार्टूनिस्ट) से मेरी मुलाकात लगभग पांच साल पहले हुई। उस दौरान राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट से डिग्री कर रहे चंद्रप्रकाश अक्सर पत्रिका के परिशिष्टों के लिए कार्टून, कैरिकेचर और चित्रकथाएं बनाने के फ्रीलांस प्रयास किया करते थे। मेरे कई घपले उजाकर करने वाली खबरों पर अक्सर चंद्रप्रकाश की प्रतिक्रियाएं मुझे मिलती रहीं। कोर्स पूरा हुआ और चंद्रप्रकाश भाग्य आजमाने मुंबई चले गए। आजकल मुंबई की एक एनिमेशन कंपनी में काम कर रहे चंद्रप्रकाश ने हाल ही मेरा कैरीकेचर बनाकर मुझे मेल किया।


चंद्रप्रकाश की इस कृति को मैं हमेशा सहेज कर रखना चाहूँगा।

Saturday, November 21, 2009

लॉटरी 40 करोड़ की, मिले 7 रुपए 20 पैसे !


जयपुर की एक जानी-मानी फार्मा कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर अरविंद सैनी को इंटरनेट के जरिए जालसाजी में फंसाया गया। अरविंद सैनी को 40 करोड़ की लौटरी लगने के ई-मेल आए और फिर मिला 7 रुपए, 20 पैसे का चैक। आप अरविंद की जुबानी ही जानें, आखिर हुआ क्या था - 'मुझे ई-मेल से 10 मिलियन डॉलर (40 करोड़ रुपए) की लॉटरी अपने नाम लगने की बात कही गई। जब लॉटरी का चैक मंगवाने के लिए मैंने अपना पता संबंधित कंपनी को भेजा, तो न्यूयॉर्क से मुझे उन्होंने मात्र 18 सेंट (7 रुपए 20 पैसे) का चैक भेज दिया। साथ ही कंपनी ने मुझे शेष रकम लेने के लिए 300 डॉलर (12 हजार रुपए) देने की बात भी कही। जब उन्होंने 10 मिलियन डॉलर की लॉटरी के बदले ही 7.20 पैसे भेजे, तो मुझसे 12 हजार लेने के बाद क्या भेजते? मैंने दोस्तों से बात की, तो उन्हें भी इस तरह के प्रस्ताव मिल चुके थे, लेकिन पैसा कभी नहीं मिला था।'

ऐसे ही मामलों पर कार्रवाई में जुटे दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम चीफ एसीपी एस.डी.मिश्रा से मेरी बातचीत हुई। मिश्रा का कहना था, 'लोटो लॉटरी स्कैम, 419, एडवांस फी रैकेट और ब्लैक डॉलर्स इन दिनों चल रहे जबरदस्त घोटाले हैं। इस तरह की धोखाधड़ी वाले ई-मेल में किए गए वादे गलत होते हैं। ये ई-मेल भेजने वाले खतरनाक अपराधी होते हैं। इस धन का उपयोग गैर-कानूनी गतिविधियों में किया जा रहा है। ऐसे मामलों में तुरंत स्थानीय पुलिस को शिकायत करनी चाहिए।'

...हो सकता है ऐसे जालसाजी से भरेपूरे ई-मेल आपको आते हों, तो कभी भी अपनी निजी जानकारियां, बैंक खातों की जानकारियां, फोन नंबर इन्हें नहीं दें। मैंने इस सारे मामले की पड़ताल करने के लिए कई जालसाजों को अपनी जानकारियां अपनी रिस्क पर सौंपी, लेकिन आप ऐसा नहीं करें।

फिर मिलेंगे, किसी नई खोज के साथ...शुक्रिया

Thursday, November 19, 2009

घोटालों का राज !


ब्लैक डॉलर घोटाला

इसे अंजाम देने वाले किसी बैंक के वास्तविक लगने वाले जाली दस्तावेजों के जरिए लेनदेन का अंतरराष्ट्रीय प्रयास करते हैं। यह दस्तावेज इतनी सफाई से तैयार किए जाते हैं कि बैंक से जुड़े लोग भी असली-नकली का फर्क पहचान नहीं पाते। इन दस्तावेजों के आधार पर खाताधारक से पूरी जानकारी जुटा ली जाती है और उसके खाते से हैकिंग के जरिए पैसा गायब कर दिया जाता है, जिसका इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए होने वाली फंडिंग में किया जाता है। व्यापारिक लेनदेन के नाम पर बनने वाले जाली एग्रीमेंट भी इसी घोटाले के तहत आते हैं।

लोटो लॉटरी घोटाला
बिना लॉटरी का टिकट खरीदे ही 1 से 10 लाख मिलियन डॉलर या इससे अधिक का जैकपॉट खुलने का झांसा ई-मेल के जरिए दिया जाता है। बदले में पूरा नाम, घर का पता, बैंक खाते का नंबर, क्रेडिट कार्ड का नंबर और पासपोर्ट की जानकारी मांग ली जाती है। किसी भी व्यक्ति की गोपनीय जानकारियों को जुटाकर उसके बैंक खाते को हैक किया जाता है और उसकी रकम एक स्थानीय या अंतरराष्ट्रीय फर्जी बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है। जहां से उसे अगले 24 घंटे में गायब कर दिया जाता है।

419 घोटाला
यह नाइजीरियन क्रिमिनल कोड है। नाइजीरिया से जुड़े अपराधी इसे विश्वभर में भेजते हैं और लुभावने अवसर का झांसा देते हैं। इसमें नौकरी, यात्रा और बड़े धन का झांसा दिया जाता है। इंटरनेट के जरिए इसे चलाने वाले विश्वभर में सर्वाधिक नाइजीरिया के लागोस में हैं। इस घोटाले को अंजाम देने पर जालसाजी से मिलने वाले धन का इस्तेमाल मादक पदार्थों (हेरोइन, कोकीन व हशिश शामिल) की युरोप, दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी एशिया और उत्तरी अमरीका में तस्करी, आतंकवादियों के लिए सहायतार्थ फंडिंग और मुद्रा के गैर-कानूनी लेनदेन के लिए किया जाता है। मादक पदार्थों की तस्करी और धन के गैर-कानूनी लेनदेन में भारत तस्करी और दलाल अहम भूमिका निभाते हैं। यह जाल नाइजीरिया, बेनिन, पश्चिम अफ्रीका स्थित कोटे डी लेवोर, टोगो, एम्सटर्डम, फिलीपींस, स्विटजरलैंड, लंदन में बड़े पैमाने पर फैला है।

(कल - 'लॉटरी 40 करोड़ की, मिले 7 रुपए 20 पैसे' में जरूर मिलें उस व्यक्ति से जिसे फर्जी ई-मेल ही नहीं फर्जी चेक भी मिला।)

Wednesday, November 18, 2009

बड़े नाम पर जालसाजी !


इस सारे मामलो की छानबीन के दौरान मुझे 104 ऐसे दस्तावेज मिले, जिनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए फ्रॉड का खुलासा हो रहा था। इनमें से ज्यादातर दस्तावेज विश्व की बड़ी संस्थाओं के दस्तावेजों की हुबहू नकल थे। इन संस्थाओं में संयुक्त राष्ट्र संघ, बैंक ऑफ अमेरिका, सिटी बैंक व बैंक की सिटी ट्रस्ट सिक्योरिटीज एण्ड फाइनेंस कं.लि., एबीएन एमरो बैंक, अफ्रीकन डेवल्पमेंट बैंक, एपेक्स बैंक, डिप्लोमेटिक कोरियर सर्विस, यूरो ट्रस्ट सिक्योरिटी, फोर्टिस बैंक, राष्ट्रीय मुद्रा विनियम कार्यालय, संयुक्त राष्ट्र संघ का एंटी टैरेरिस्ट डिपार्टमेंट, ब्रिटेन की मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस एण्ड फेयर टे्रडिंग और हांगकांग की एशिया कॉमर्शियल होल्डिंग्स इंटरनेशनल लि. जैसी संस्थाएं शामिल थी। ई-मेल के जरिए इन बड़े नामों का इस्तेमाल करने वालों ने अधिकतर मामलों में वित्तीय संस्थाओं की आड़ में पूरा खेल रचा था।


(देश की खूफिया एजेंसियों, साइबर क्राइम विशेषज्ञों और पुलिस की नाक में दम करने वाले तीन घोटालों की सच्चाई कल की कड़ी ('घोटालों का राज !') में जरूर पढ़ें।)

Tuesday, November 17, 2009

इस जाल में माल कहां !


देश की आंतरिक सुरक्षा में तकनीक के जरिए सेंध लगाकर विदेशी शातिर धोखाधड़ी को अंजाम देने में जुटे हैं। यह धोखाधड़ी इतने बड़े पैमाने पर हो रही है कि देश के साइबर क्राइम विशेषज्ञ और तकनीकी जानकारों के होश उड़े हुए हैं। नाइजीरिया, ऑस्ट्रेलिया, बेनिन और ब्रिटेन सहित एक दर्जन से ज्यादा देशों से प्रसारित फर्जी और लुभावने ई-मेल इस धोखाधड़ी का अहम साधन बन रहे हैं।


ई-मेल के जरिए तीन बड़े घोटालों (ब्लैक डॉलर घोटाला, लोटो लॉटरी घोटाला, 419 घोटाला) को अंजाम दिया जा रहा है। इन घोटालों में लिप्त जालसाजों व दिल्ली पुलिस के अलग-अलग अधिकारियों और ऐसे मामलों पर जांच में जुटी एजेंसियों से तथ्य जुटाए। इसी पड़ताल में मेरा संपर्क उन लोगों से बना, जो इस तंत्र को सुगठित गैंग के जरिए चला रहे हैं। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक जयपुर, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों से अफ्रीकन देशों से आए जालसाज सारा खेल कर रहे हैं। इस जालसाजी से कमाए धन का उपयोग आपराधिक गतिविधियों के इस्तेमाल में हो रहा है। जिनमें फर्जी पासपोर्ट बनवाना, ड्रग कारोबार में पैसे का इस्तेमाल और हुंडी जैसे गैर कानूनी तरीकों से पैसे को जुटाना शामिल हैं।


डेढ़ अरब का प्रस्ताव


ई-मेल के जरिए धोखाधड़ी की तफ्दीश करते समय मैंने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से जानकारी जुटाने के बाद इंटरनेट के जरिए कुछ संपर्क साधे। मुझे जो लुभावने ई-मेल आए थे, मैंने उन पर संपर्क किया। इस प्रक्रिया के दौरान बेनिन के सेंट्रल बैंक गवर्नर कार्यालय के कथित विदेश विभाग के नाम से मुझे ई-मेल के जरिए संपर्क किया गया। संपर्क डॉ. डेविड उकपडी ने किया जिन्होंने खुद को सेंट्रल बैंक का सचिव बताया।ई-मेल में डॉ. डेविड ने साफ तौर पर कहा कि, 'बेनिन सरकार के आदेश हैं कि 3 करोड़, 88 लाख अमरीकी डॉलर यानी लगभग एक अरब, 55 करोड, 20 लाख रुपए तत्काल आपके खाते में डलवा दिए जाएं। इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) के जरिए कुछ समस्या होने के कारण हम यह पैसा आपको टेलीग्राफिक ट्रांस्फर या स्विफ्ट ट्रांस्फर के जरिए ही भेज पाएंगे। इसके लिए बैंक की सभी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं और आपका पैसा एक डोमेंट खाते में अगले दावे तक के लिए रख दिया गया है। आप हमें अपना फोन नंबर और घर का पता तुरंत भिजवाएं ताकि आप अपना पैसा यूरो के्रडिट यूनियन के जरिए तुरंत ले सकें।'


6 करोड़ की सौदेबाजी, 22 करोड़ का सौदा


एक और मामले में कथित जिम्बाव्वे निवासी मार्क काबारेट ने खुद को 45 वर्षीय शिपिंग व्यापारी (न्योनी शिपिंग लाइंस से संबंधित) बताकर मुझसे लगभग 6 करोड़ रुपए की मांग की। मार्क के मुताबिक वह अर्से से ब्रिटेन में हैं और अपना शिपिंग व्यापार हाल ही ब्रिटिश सरकार के कारण छोड़ चुके हैं। मार्क ने कहा, 'आपके द्वारा भेजा गया 6 करोड़ रुपया मैं एक सिक्योरिटी फर्म के जरिए वापस भारत लाऊंगा, जहां हम मिलकर व्यापार करेंगे। इसके बदले 20 प्रतिशत एक मुश्त और तीन वर्ष बाद पूरी रकम 5 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस लौटाऊंगा।' मार्क ने प्रस्ताव के जवाब के साथ निजी फोन नंबर व पते की मांग भी की। इसके बदले मैंने मार्क को व्यापार के लिए 6 की बजाय लगभग 4 करोड़ रुपए देने की बात कही। सौदे की इस वार्ता की एवज में मार्क ने मुझे ई-मेल पर 5.5 मिलियन अमरीकी डॉलर यानी लगभग 22 करोड़ रुपए का 3 पन्नों वाला एग्रीमेंट अपने वकील ऐलन कॉली से तैयार करवाकर भिजवा दिया। इस एग्रीमेंट के मुताबिक मुझे 22 करोड़ रुपए मार्क को देना व इसे खर्च करने के अधिकार मार्क को देने की बात कही गई थी, जिस पर मुझसे महज हस्ताक्षर की मांग की गई थी। इस संबंध में मैंने नाइजीरिया पुलिस की ऐसे घोटालों पर काम कर रही विशेष टीम से संपर्क भी साधा, लेकिन दो महीने से भी ज्यादा समय निकल जाने के बावजूद नाइजीरिया पुलिस की इन घोटालों पर काम कर रही स्पेशल टीम ने कोई जवाब नहीं दिया।


फर्जी पता, फर्जी व्यापारी


खुद को ब्रिटिश व्यापारी बताने वाले मार्क और उसके वकील एलन कॉली की वास्तविकता का पता लगाने के लिए मैंने इंग्लैंड संपर्क साधा। मार्क और उसके वकील द्वारा दिए पते पर एग्रीमेंट मिलने के अगले ही दिन संपर्क भी किया गया, जिसमें पता चला कि न तो इस नाम से कोई व्यक्ति यहां है और न ही मार्क के वकील की कंपनी अस्तित्व में है। एग्रीमेंट में लिखे पते का जो प्लॉट का नंबर मार्क ने 383 बताया उस जगह इस नंबर का प्लॉट था ही नहीं।


(अगली कड़ी में आप कल जानेंगे दुनिया की कौन-कौन सी बड़ी कंपनियों, बड़े नामों के हुबहू फर्जी दस्तावेजों को जरिया बनाकर हो रही है जालसाजी - पढऩा ना भूलें 'बड़े नाम पर जालसाजी')

Friday, November 13, 2009

फर्जीवाड़े की मिसाल देखिए...


ऐसे ही फर्जीवाड़े से आप जरूर रूबरू हुए होंगे। 5-50 लाख डॉलर की लॉटरी का कोई ई-मेल आपके पास भी आया होगा। मुझे भी आया। करोड़ों के सौदे का एक प्रस्ताव मैंने ऐसे ही जालसाज से अपने नाम पर मंगवा भी लिया। ...लेकिन अब तो हद हो गई। मेरे एक मित्र को इसी महीने की 3 तारीख को जालसाजी से भरापूरा ई-मेल 'हिंदी' में मिला है।

इस तस्वीर को देखकर फर्जीवाड़े की हद का अंदाजा आप भी लगा सकते हैं। पहले जहां ऐसे ई-मेल अंग्रेजी भाषा के उपयोग के साथ मेल बॉक्स में आया करते थे, अब हिंदी में आने लगे हैं।

ऐसे ही एक मामले को खंगालता-खंगालता जब मैं काफी आगे निकल गया, तो मुझे पिछले दिनों कई गोपनीय बातों का पता चला। पुलिस विभाग के चंद सूत्रों और डीआईजी से मेरी मुलाकातों में सामने आया कि ऐसे फर्जीवाड़ों में लोकल दलाल बड़ी भूमिका निभाते हैं। कैसे चलता है सारा खेल आप जल्द ही (17 नवंबर को) यहां पढ़ सकते हैं। बस ऐसे जालसाजों से सावधान रहिए और अगली कड़ी का इंतजार कीजिए। कुछ पुख्ता सबूतों के साथ अगली मुलाकात होगी....

Thursday, October 29, 2009

तूफानों की कमी नहीं जीवन में...


बिना पैरों वाले फोटोग्राफर केविन कोनोली ने खींची विश्वभर में घूम-घूम कर 32 हजार से ज्यादा तस्वीरें। ...आप भी जाने इस तूफानों से भरे जीवन को केविन की ही जुबानी।

मैं 22 साल का हूँ। मेरे दोनों पांव नहीं हैं। बस दो हाथ ही मेरी जिंदगी का सहारा हैं। इन्हीं हाथों के सहारे स्केट बोर्ड पर मुझे अपना सारा सफर तय करना होता है। मैं दो बार पूरी दुनिया घूम चुका हूँ। सफर पूरा होने से पहले मैं अगले सफर की प्लानिंग शुरू कर देता हूँ। मैं व्यावसायिक फोटोग्राफर हूँ और अब तक विश्व भर से 32,728 से ज्यादा तस्वीरें खींच चुका हूँ।


अमरीका के हैलिना में मैंने जन्म लिया था। मेरे पैदा होते ही मां और पिताजी को डॉक्टर का जवाब मिला, 'इसे स्पॉरेडिक बर्थ डिफेक्ट' है। बचपन से ही दोनों पांव नहीं हैं। अपने निचले धड़ को घसीट कर चलना और दोनों हाथों को अपने चलने का साधन बना लेने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। सात साल की उम्र में घरवालों ने मुझे चमड़े की पैंट तैयार करवा कर दी। अक्सर जमीन की रगड़ से शरीर छिल जाता था। इसी रगड़ से मैं बचा रहूँ, मैंने इस पैंट को पहना जो आज तक मेरे साथ है। यह चमड़े और रबर से बनी है, ताकि मुझे चलने में असुविधा न रहे। मुझे हर रोज मां व्हील चेयर पर बिठाकर स्कूल छोडऩे जाती और वापस लाती। इसी समय अपने शरीर का संतुलन बनाना सीखने के लिए मैंने जिम्नास्टिक की क्लास में जाना शुरू कर दिया था। जब मैं 18 साल का हुआ, तो मुझे स्केट बोर्ड दिलाया गया। ...और जैसे मेरे शरीर के पंख ही लग गए। कॉलेज में क्लास लेने के बाद मैं अपना ज्यादा से ज्यादा समय स्केट बोर्ड पर कॉलेज कैंपस में इधर-उधर घूमने में बिताता था। हमेशा महसूस करता कि मैं साधारण व्यक्ति से भी तेज दौडऩे में सक्षम हूँ।


मुझे कभी नहीं लगा कि हार मानने का वक्त आ गया है। मैंने स्केट बोर्ड इतना अच्छे तरीके से सीखा कि एक्स गेम्स में मुझे स्केटिंग के लिए सिल्वर मैडल मिला। जब मैंने एक्स गेम्स में सिल्वर मैडल जीता, तो मुझे इनाम के तौर पर 11 सप्ताह यूरोप और एशिया घूमने का मौका दिया गया। मेरी फोटोग्राफी को 'द रॉलिंग एग्जीबिशन' नाम से प्रस्तुत करना चाहते थे। अपने बड़े कलेक्शन को मैंने निकोन के उस कैमरे से तैयार किया है, जो अक्सर मेरी पीठ पर ही टंगा रहता है। मैंने मजदूरों, बच्चों, भिखारियों, फसलों पर अपनी फोटोग्राफी को केंद्रित रखा है। फोटोग्राफी की शुरुआत मैंने वियना से की थी और मेरी पहली ही फोटोग्राफी सिरीज को जमकर सराहना मिली। मुझे याद है, जब मैं मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी में फोटोग्राफी की पढ़ाई करने गया, तो अपनी पहली क्लास में एक रील भी पूरी नहीं कर पाया था। यहीं पर मैंने फिल्म संबंधी क्लास भी ली थी, जिसमें मैंने असल फोटोग्राफी के मायने सीखे। मेरी फोटोग्राफी को हर जगह सराहना मिली। इसी वजह से मुझे मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी की ओर से फोटोग्राफी ग्रांट (फोटोग्राफी सीखने के लिए सहायता) दी गई, जिसके तहत मैं फोटोग्राफी करने के लिए स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड और फिर आइसलैंड गया। मैं पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड भी गया और अपनी डिग्री वहीं से पूरी की।


मैं थिएटर आर्टिस्ट भी हूँ और अखबारों के लिए लिखना मेरा शौक है। अब तक स्केट बोर्ड से खेली जाने वाली कई स्थानीय प्रतियोगिताओं में मैं भाग ले चुका हूँ। मैं हमेशा यही जानना चाहता था कि यह दुनिया कितनी कलात्मक है? जब सफर पर निकला, तो आज तक रुक ही नहीं पाया। सब मुझे देखते ही हैरत करते हैं और मेरे दोनों पांव नहीं होने की वजह तलाशने की कोशिश करते हैं। मैंने 15 देशों के 31 शहरों से जब तस्वीरें खींची, जिन्हें देख हर किसी ने सराहा। मैं खुश हूँ, मैंने जितना पाया, उतने की उम्मीद कभी नहीं की थी। अपने दोनों पांव न होने का जरा सा भी मलाल मुझे नहीं है। दुनिया घूमी है इसलिए महसूस करता हूँ कि मेरी जिंदगी खुद एक तस्वीर की तरह है, इसमे जितनी खुशी के भाव होंगे, उतनी ही खूबसूरत तस्वीर बनेगी।

Saturday, October 17, 2009

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं


यह दीपावली आपके पूरे परिवार के लिए ढेर सारी खुशियां और समृद्धि लाए। तरक्की के नए रास्ते खोले और सपनों को सच करने की एक नई शुरुआत बने। यह दीपावली हमारे ब्लॉगर परिवार के लिए भी नया दौर लेकर आए। इस दीपावली आप अपने परिवार को पूरा समय दें और बच्चों को ढेर सारा दुलार।


दीपावली मुबारक

Saturday, October 10, 2009

वो शमा क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करे...


मैं 18 स्वर्ण पदक जीतने वाली तैराक (नताले डू टॉएट) हूँ। मेरा सिर्फ एक पैर सलामत है। ओलंपिक और कॉमनवेल्थ खेलों में अपने खेल का लोहा मनवाने के बाद अब मैं 2012 में लंदन में होने जा रहे ओलंपिक की तैयारियों में जुटी हूँ। वह 25 फरवरी, 2001 की सुबह थी, जब मैंने अपना बायां पैर केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) में एक कार एक्सीडेंट में खो दिया। मैं हर रोज की तरह अपने स्कूटर पर तैराकी की प्रैक्टिस के लिए स्कूल जा रही थी। एक कार ने मेरे स्कूटर को टक्कर मारी और मेरा बायां पैर टूट गया। पैर की हड्डियां और मांसपेशियां कुछ इस तरह कार से कुचल गईं, जिन्हें जोड़ पाने में डॉक्टर भी असमर्थ थे। हादसे के सातवें दिन डॉक्टरों ने मेरा पांव घुटने से काट दिया था। चौदह बरस की उम्र में मैंने उस पांव को खो दिया, जिसकी मेरी जिंदगी और तैराकी में भी खासी अहमियत थी। इससे पहले क्वालालांपुर में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स (1998) में मैं तैराक के तौर पर भाग ले चुकी थी। ...लेकिन मेरी आगे की कहानी एक नई शुरुआत के साथ बुनी जानी थी।


हादसे के बाद मैंने ढेर सारी मुश्किलों का सामना किया। कभी खुद को विकलांग नहीं समझा, लेकिन कदम-कदम पर जूझना पड़ा। अपने सामथ्र्य में जितना था मैंने किया। सिर्फ एक सपना पाला कि 'मैं सब कुछ कर सकती हूँ। सब कुछ करूंगी।' हादसे के पांच महीने बाद मैं वापस स्वीमिंग पूल में लौटी और सालभर बीतते-बीतते मैंने अपने आधे पांव को साथ लेकर तैरना सीख लिया। इसी समय मैनचेस्टर में हो रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में मैंने डिसेबल्ड स्विमर्स की श्रेणी में 50, 100 और 800 मीटर तैराकी में भाग लिया। यहीं मुझे 'डेविड डिक्सन अवॉर्ड' आउटस्टैंडिंग एथलीट ऑफ द गेम्स के तौर पर दिया गया। इंग्लैंड के विस्टा नोवा स्कूल के विकलांग बच्चों की मदद के लिए भी मैंने कई तैराकी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। जोहांसबर्ग में आयोजित इस प्रतियोगिता में 12-13 डिग्री ठंडे पानी और शार्क के बीच साढ़े सात किमी। तक तैराक को पानी में जूझना होता है। मैंने 7.5 किमी. की ओपन वॉटर स्विम को 1:35:45 घंटे में पूरा करके विश्व रिकॉर्ड भी बनाया है। 2003 के एफ्रो एशियन गेम्स में मुझे रजत और कांस्य पदक भी मिला है। फ्रीस्टाइल तैराकी की कॉमनवैल्थ और पैराओलंपिक प्रतियोगिताओं में भी मैं हिस्सा ले चुकी हूँ। 2006 में मैंने चौथी आईपीसी वल्र्ड स्विमिंग चैंपियनशिप में भी छह स्वर्ण पदक जीते। बीजिंग ओलंपिक (2008) में 10 किलोमीटर ओपन वॉटर स्विमिंग रेस में मैंने हिस्सा लिया और मैं सोलहवें नंबर पर रही। यहीं बीजिंग के पैराओलंपिक में मैंने पांच स्वर्ण पदक जीते।


दक्षिण अफ्रीका के ब्रॉडकास्ट कॉर्पोरेशन की ओर से कुछ समय पहले जारी टॉप 100 ग्रेट साउथ अफ्रीकंस की सूची में मुझे 48वां स्थान मिला। मुझे 2008 के समर ओलंपिक्स की ओपनिंग सेरेमनी में अपने देश का झंडा पकडऩे वाले खिलाड़ी के तौर पर भी चुना गया। अब मैं लंदन (2012) में होने जा रहे ओलंपिक की तैयारी में जुटी हूँ। जो दर्द और वक्त की मार मैंने झेली है वह आसानी से मुझे तोड़ सकती थी, लेकिन अब मेरा भरोसा और मजबूत हो गया है। अब मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकती हूँ, 'अगर मैं सपना पूरा कर सकती हूँ, तो कोई भी कर सकता है।'

Friday, September 11, 2009

बिना हाथों के तैराकी में विश्व रिकॉर्ड ! आश्चर्य !


आपकी सांसे अटक जाएंगी, जब आप इस बिना हाथ वाले तैराक को जानेंगे। आपको पता चलेगा कि इस असाधारण प्रतिभा के धनी ने वह सब कुछ अचीव किया है, जो लोग दोनों हाथ होकर भी नहीं कर पाते। तैराकी में बिना हाथों के विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले रूस के चर्चित तैराक इगोर प्लोत्नीकोव के हौसलों को जानें, उन्हीं के शब्दों में -

मैं जिंदा हूँ, क्योंकि मौत मुझे खौफजदा नहीं कर पाती। लोग अपाहिज को दया भाव से देखते हैं, लेकिन उनकी इसी नजर से मुझे नफरत है। आखिर क्यों मुझे या किसी भी अपाहिज को वो ऐसी निगाहों से देखते हैं, जिनमें तरस भरा हो। ...दया भाव भरा हो। मैंने बस उम्मीद पर अपना जीवन जीया है और अपने हौसले पस्त नहीं होने दिए। जानता हूँ, मुश्किलें तो हर इंसान को तोडऩे ही आती हैं, लेकिन मैं टूट जाना पसंद नहीं करता।

आपको खुशी होगी जानकर कि मैंने बिना हाथों के भी तैराकी में विश्व रिकॉर्ड कायम किया है। 2004 में एथेंस में हुए पैराओलंपिक खेलों में मैंने भाग लिया और तैराकी करते हुए 32.52 सैकंड में 50 मीटर की बटरफ्लाई स्वीमिंग में रिकॉर्ड बनाया। आप सोच रहे होंगे बिना हाथों के एक तैराकी प्रतियोगिता में मैं कैसे प्रतियोगी बन पाया, कैसे उन लोगों को टक्कर दे पाया, जिनके दोनों हाथ वहां सलामत थे और वो तैर रहे थे? लेकिन शायद जिसे सबने मेरी कमजोरी समझा, उसी मजबूती ने, मजबूत हौसले ने मुझमें जीतने की ज़ील पैदा की।

मैं सिर्फ इतना ही जानता हूँ कि जीजस ने किसी को भी बिना वजह इस दुनिया में नहीं भेजा है। न आपको न मुझे। वे चाहते हैं कि मैं कुछ बड़ा काम करूं। शुरुआत मैं कर चुका हूँ। जब आगाज ऐसा है, तो अंजाम भी अच्छा ही होगा। ...लेकिन बस आप किसी अपाहिज को कमजोर नजरों से मत देखना। एक हौसला देना उसे...। ऐसा हौसला जो उसमें दुनिया जीतने का जज्बा पैदा कर सके।

Sunday, September 6, 2009

बिना हाथ और पैरों के जिंदगी की जंग !


एक जगह आकर छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, मैं-तुम सारी दूरियां मिट जाती हैं। जंग होती है, तो जिंदगी से जूझने की। हौसला बनाए रखने की। बिना दोनों हाथ और बिना दोनों पैरों के भी विजेता बनने का सपना बुनने और उसे पूरा करने का हौसला रखने वाले इस शक्स क्ले डायर को देखकर मुझे तो यही लगता है। ...कुछ न हो, तो भी कैसे हंसी-खुशी भी जिंदगी को जिया जाए, क्ले अपने शब्दों में बेहतर तरीके से बता सकते हैं-

अगर आपके हाथ-पैर सलामत हैं, तो अपने आपको खुशकिस्मत समझिए। मेरे न तो हाथ हैं न पैर। सिर्फ आधा हाथ है, वह भी ऐसा कि अब तक जिसने देखा, उसे हाथ के होने न होने में कोई अंतर नजर नहीं आया। आज तीस साल की उम्र में मेरी ऊंचाई मात्र 40 इंच और वजन 39 किलोग्राम है। मेरी पैदाइश हैमिल्टन, अल्बामा की है। मेरी पहचान सिर्फ इतनी ही नहीं है। एक पेशेवर मछुआरा, जो बिना हाथ-पैरों के 200 से ज्यादा मछली पकडऩे वाली प्रतियोगिताओं का आकर्षण रह चुका है, के तौर पर मेरी पहचान ज्यादा मजबूत है। आपको खुशी होगी जानकर कि इनमें 25 प्रतियोगिताओं में मैंने जीत हासिल की है।
हैमिल्टन में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के बाद पांच साल का होते-होते मुझे खुद और दूसरे बच्चों में फर्क का पता चला। मेरे दोनों हाथ और दोनों पांव नहीं थे। एक 16 इंच का दायी तरफ आधा-अधूरा हाथ मेरे शरीर से चिपका था, जिसे कभी किसी ने इस अधूरे शरीर पर फायदेमंद नहीं समझा। एक छोटी व्हील चेयर मुझे बचपन में ही दिला दी गई। इसी से मुझे मां, तो कभी पिताजी स्कूल छोड़कर आते और वापस लाते। लेकिन अपने आधे हाथ का सहारा लेकर अपने छोटे-मोटे काम मैंने खुद करने शुरू कर दिए थे। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल का होते-होते मैंने मछलियां पकडऩी शुरू कर दी। जब पहली बार मछली पकडऩे गया, तो पूरी तरह डरा हुआ था। बोट को चलाने में मुझे बेहद डर लग रहा था। ...लेकिन मैं अंदर ही अंदर महसूस करता था कि डर के आगे जीत है। कुछ ही दिनों में मैंने संतुलन बनाना सीख लिया था, लेकिन ज्यादातर मछुआरे मेरी क्षमताओं को लेकर आशंकित रहते। उन्हें आश्चर्य होता मुझे देखकर कि मैं औरों जैसा नहीं हूँ और मैं उस तरीके से मछलियां नहीं पकड़ सकता। मैंने कुछ तरीके ईजाद किए जैसे अपने दांतों से गांठ लगाना और मछली कांटे में फंसते ही ठुड्डी का सहारा लेकर उसे बाहर निकाल लेना।
मछली पकडऩे के लिए बोट भी खुद ही ड्राइव करना बेहद मुश्किल होता है। कई बार मेरे दोस्त बोट ड्राइव करते हैं और मछलियां पकडऩे के लिए मैं छड़ को अपनी ठुड्डी का सहारा देता हूँ। मछली पकडऩे के कांटे में गांठ लगानी हो, तो अपनी जीभ और दांतों की मदद लेता हूँ। मुझे तैराकी पसंद है। जब भी मछली पकडऩे की कोई प्रतियोगिता होती है, तो पूरा शरीर थककर चूर हो जाता है। ऐसे में अपने शरीर को रिलैक्स देने के लिए मुझे अगले ही दिन स्वीमिंग करनी पड़ती है। मैं जानता था कि मुझमें सीखने की इच्छाशक्ति कूट-कूट कर भरी है और मैं जितना समय मछलियां पकडऩे में दूंगा, मेरा हुनर उतना ही संवरता चला जाएगा।

जब भी दूसरे मछुआरे मुझे देखते थे, वह समझ ही नहीं पाते कि यह आधे हाथ वाला आदमी मछली कैसे पकड़ेगा? मैं हमेशा सिर्फ इतना ही सोचता हूँ कि जहां हूँ, वहां सबसे बेहतर क्या कर सकता हूँ? मुझे बचपन से बेसबॉल खेलना पसंद रहा है। मैं हमेशा जानता था कि मैं कभी पेशेवर बेसबॉल खिलाड़ी नहीं बन पाऊंगा, लेकिन मेरा पक्का विश्वास था कि मैं बेहतरीन पेशेवर मछली पकडऩे वाला बन सकता हूँ। ...और मैंने सही सोचा था। मुझे लगता है मैं वही कर पाता हूँ, जो ईश्वर मुझसे करवाना चाहता है।

 
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